Saturday, 18 November 2017

जीवन उपहार है, इसका आनंद उठाएं

एक नेत्रहीन लड़की थी। वह खुद को कोसती रहती थी। वह सबसे नफरत करती थी, सिवाय अपने एक दोस्त को छोड़कर। वह अक्सर कहती कि अगर उसको दुनिया देखने को मौका मिलेगा तो वह अपने दोस्त से शादी कर लेगी। वह अपने एकमात्र दोस्त की तारीफ करते नहीं थकती, क्योंकि वही एक दोस्त था, जो उसको सहयोग करता था। 

एक दिन इस लड़की को कोई आंखें दान कर देता है। आपरेशन के बाद वह देखने लग जाती है। वह अपने दोस्त को देखने की इच्छा जाहिर करती है। जब अपने दोस्त को देखती है तो उसको नेत्रहीन पाती है। वह उससे शादी करने का ख्याल छोड़ देती है। वह उससे शादी करने से साफ मना कर देती है। 

उसका यह फैसला जानकर दोस्त दुखी मन से उससे दूर जाने का इरादा कर लेता है। जाते समय वह उससे कहता है कि तुम मुझसे शादी करने का अपना इरादा बदल रही हो,कोई बात नहीं। लेकिन ...

दोस्त, तुम मेरी आंखों का ख्याल रखना। 

आमतौर देखा जाता है कि स्थिति परिवर्तित होने पर लोगों का दिमाग भी बदल जाता है। कुछ ही लोग यह जानने की कोशिश करते है कि वर्तमान स्थिति से पहले वह क्या थे। अधिकतर लोग यह भी भूल जाते हैं कि विपरीत परिस्थितियों में उनके साथ कौन लोग थे। 


  • जीवन एक उपहार है। 
  • आप किसी को अपशब्द कहने से पहले उनके बारे में सोचो, जो बोल नहीं सकते। 
  • आप भोजन के स्वाद के बारे में शिकायत करने से पहले उनके बारे में सोचो, जिनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं है।
  • इससे पहले कि आप जीवन के बारे में शिकायत करते हैं, उन लोगों के बारे में सोचो, जो कम आयु में ही दुनिया को अलविदा कह गए। 
  • जब आप थके हुए होते हैं और अपनी नौकरी के बारे में शिकायत करते हैं तो कृपया करके उनके बारे में भी सोचो, जो रोजगार के लिए तरस रहे हैं। 
  • किसी अन्य की निंदा करने से पहले सोचो कि हममें से कोई भी पाप रहित नहीं है। 
  • जब निराशाजनक विचार आपको आगे बढ़ने से रोकते हैं, तो अपने चेहरे पर मुस्कुराहट लाएं और भगवान का धन्यवाद करें कि आप जीवित हैं और अभी भी अपने लोगों के आसपास हैं। 
  • जीवन एक उपहार है - इसका आनंद लें, इसका जश्न मनाएं और इसे पूरा करें।

Thursday, 16 November 2017

बालिग होता उत्तराखंडः क्या अब मिल जाएगा सही जवाब

उत्तराखंड राज्य की उम्र 17 साल पूरी हो गई और यह 18 वें वर्ष में लग गया यानि यह वयस्क होने जा रहा है। 18 साल की आयु में किसी व्यक्ति को मतदान का अधिकार मिल जाता है। शायद यह समझा जाता है कि वह फैसले लेने में सक्षम हो गया है। नवंबर 2018 में उत्तराखंड भी वयस्क हो जाएगा। क्या समझा जा सकता है कि राज्य में बुनियादी सुविधाओं और सेवाओं पर कुछ ज्यादा करने की जरूरत नहीं है। 

क्या शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वरोजगार, गुड गवर्नेस और अन्य सेवाओं के क्षेत्र में हम सक्षम हो गए हैं। क्या हर व्यक्ति के लिए तरक्की का रास्ता खुल गया है। लेकिन आईएएस वीक पर मुख्यमंत्री ने अफसरों से जो सवाल पूछे, उनको देखते हुए तो यही कहा जा सकता है, 17 साल बाद भी इस चुनौती पर मंथन हो रहा है, राज्य में विकास की नींव कैसे डाली जाए। आइडिया मांगे जा रहे हैं। प्लानिंग और क्रियान्वयन की बात तो बाद की है। क्या आज 17 साल बाद भी हम वहीं हैं, जहां 9 नवंबर, 2000 को थे। 

मैं अभी तक के विकास को खारिज नहीं कर रहा। राज्य बनने के बाद विकास कार्य हुए हैं। मैदानी जिलों में उद्योग खुले हैं, रोजगार की संभावनाओं में वृद्धि हुई है। नई सड़कें बनी हैं और बन रही हैं, भले ही निर्माण धीमी हो रहा है। शिक्षा में कुछ काम हुआ है। नये अस्पताल खुले हैं। सरकार और आम व्यक्ति के बीच की दूरी लखनऊ के जमाने की तुलना में कम हुआ है। सियासी विकास हुआ है। जो भी विकास हुआ है, उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। एक तरफा यह कह देना कि राज्य बनने से कुछ नहीं हुआ, गलत हो सकता है। 

फिर से मुद्दे पर आते हुए, मैं मुख्यमंत्री के सवालों पर सवाल नहीं उठा रहा हूं। उनके सवाल वर्तमान स्थिति को देखते हुए सही हैं, क्योंकि माहौल ही कुछ ऐसा है। मुख्यमंत्री ने ऐसा महसूस किया होगा, तभी तो उन्होंने यह सवाल उठाए हैं, जिनको राज्य गठन के पहले दिन ही पूछा जाना चाहिए था। क्योंकि उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहने के समय अलग राज्य के लिए आंदोलन की वजह भी कुछ इसी तरह की चुनौतियां थीं, जिनके जवाब आज सीएम ने नौकरशाही से मांगे हैं। 

अगर पहले दिन से ही इन पर ध्यान देकर योजनाएं बनाकर सही पात्रों तक पहुंचा दी जातीं, तो शायद आज के सवाल कुछ और होते। उत्तराखंड के बालिग होने के दिन तक क्या हमें इन सवालों के जवाब मिल जाएंगे। क्या इन पर योजना और क्रियान्वयन से कुछ रिजल्ट मिल जाएंगे। क्या हमें ऐसी उम्मीद राज्य सरकार और उसके सिस्टम से करनी चाहिए। 

मुख्यमंत्री ने आईएएस वीक के उद्घाटन पर नौकरशाही से सवाल किया। जीरो बजट की कौन सी कल्याणकारी जन योजनाएं चलाई जा सकती हैं। चकबंदी कौ कैसे प्रोत्साहित किया जाए। किसान की मदद के लिए आपका क्या विजन है। स्कूली शिक्षा का स्तर कैसे सुधारा जाए। पहाड़ों में स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए क्या कदम जरूरी हैं। मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष का आम जनता के हित में अच्छे से अच्छा उपयोग कैसे होना चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं को कैसे मजबूत किया जाए। सीएम ने नदियों को पुनर्जीवित करने को लेकर भी विचार साझा करने को कहा है। 

17 साल बाद भी ये चुनौतियां दूर नहीं की जा सकीं तो कितना वक्त चाहिए उत्तराखंड के सरकारी सिस्टम को। सीएम ने उत्तराखंड की नौकरशाही से आइडिया और सहयोग मांगा है, उम्मीद है छह माह में ही सही कोई न कोई आइडिया मिल जाएगा और 9 नवंबर 2008 तक धरातल पर भी उतर जाएगा। अगर ऐसा नहीं हो सका तो समझा जाएगा कि आज भी वही हुआ है, जो वर्षों पहले से होता आया है। फिर से सवालों और संकल्पों के किस्से..। 









Saturday, 4 November 2017

दो माह की बच्ची ने बता दिया जिंदगी क्या है...

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दो माह की बच्ची ने मुझे बता दिया कि असली जिंदगी क्या है। जिंदगी का मकसद क्या है और इसको किस तरह जीना है। आप कहेंगे कि पागलों जैसी बात मत करो, जो मन आया वह लिख दिया। क्या यही सब पढ़ाओगे हमें। आप बिल्कुल सही हैं, शायद मैं गलत साबित हो जाऊं। पर मैंने जो महसूस किया, वह लिख रहा हूं। आगे आपकी मर्जी।

उससे मेरी मुलाकात अचानक हुई, जब मैं कहीं जा रहा था। मैंने उसको दादी की गोद में देखा और यूं ही उसकी ओर चुटकी बजा दी। वह मुस्करा गई, मानो मुझसे पहले भी मिली हो। उसकी इस मुस्कराहट में न तो कोई छल था और न ही किसी तरह की खुशी या फिर कोई दर्द। इस मुस्कराहट में उसका कोई मकसद नहीं था और न ही उसके पीछे कोई लालच। वह न तो किसी को नीचा गिरते देखकर मुस्करा रही थी और न ही किसी की तरक्की पर खुशी जता रही थी। उसकी मुस्कराहट निर्दोष थी, ठीक उस झरने की तरह जो ऊंचाई से नीचे गिरने का साहस केवल परोपकार के लिए करता है। शांति, सुकून और इंसानियत में वह कहीं ज्यादा ऊंचाई पर आसमां छू रही है और मैं उतना नीचे धरती पर बेचैन। वह मुझे भागदौड़ और स्पर्धा के युग में शांत पलों की ताकत का ज्ञान करा रही थी।

अभी तो वह स्नेह और लाड़ दिखाने वाली भाषा समझ रही है। वह इंसानों में रहने के नियमों को नहीं जानती। छल, कपट से बचने के तरीकों का उसको कोई ज्ञान नहीं है। केवल मुस्कराना जानती है, जो जीने के लिए जरूरी है। शायद नेचुरल मुस्कराहट का कॉपी राइट उस जैसे बच्चों के पास ही है, बाकि तो सब अलग-अलग मकसद के लिए इनकी नकल कर रहे हैं।

वाकई, मुझे उस प्यारी सी बच्ची को देखकर काफी सुकून मिला और मैं एकटक उसको देखता रहा। सोचता रहा कि इसकी मुस्कराहट में ऐसा क्या है, जो औरों में नहीं। वह बार-बार मुस्करा रही थी। शायद मुझसे कह रही थी कि अगर मेरी तरह जीना चाहते हो तो खुशियों के पीछे दौड़ना बंद कर दो। मुझे देखो, क्या आपको लगता है कि मैं किसी जल्दबाजी में बेचैन जिंदगी जी रही हूं। यह सब इसलिए है कि मैं खुद में जी रही हूं और बाहरी दुनिया, जो हमारे लिए आकर्षण है, उसको मैंने नहीं देखा है।

मैं इस मायावी दुनिया में आ गई हूं, लेकिन अभी अपनी मां की गोद में हूं, जो किसी भी बच्चे के लिए सबसे सुरक्षित जगह है। मैं तुमसे ज्यादा ताकतवर हूं, क्योंकि मेरा कोई मकसद नहीं है। मैं किसी स्पर्धा का हिस्सा नहीं हूं। मैं बेचैन नहीं हूं। मैं न तो छल करती हूं और न ही छल से बचने के लिए संघर्ष। मैं किसी को हराने की साजिश नहीं रच रही और न ही किसी से जीतने की रणनीति बना रही । मुझे न तो कल की चिंता है और न ही आज और अभी की। मैं किसी भी बंधन से मुक्त हूं। अभी मैं न तो धर्म को जानती हूं और न ही किसी क्षेत्र और भाषा बोली को। क्या अब भी तुम जानना चाहते हो कि मेरी मुस्कराहट इतनी निर्दोष कैसे है....।













Monday, 30 October 2017

नेचुरल से ज्यादा स्मार्ट हो गया आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ?

नेचुरल इंटेलीजेंस अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस पर निर्भर हो गया। पूरी दुनिया रोबोटिक्स की ओर दौड़ रही है। हमारे आसपास तमाम तरह के रोबोट दिख रहे हैं, जो एक क्लिक पर हमें दुनिया दिखा रहे हैं। पूरी दुनिया की जानकारी सेकेंडों में पेश कर रहे हैं ये रोबोट। ये अब उस पुराने लोहे की ढांचे तक ही सीमित नहीं रह गया है, जो लगभग तीस साल पहले हमने टीवी पर हर शनिवार आने वाले रोबोट सीरियल में देखा था। हमारा मोबाइल, कंप्यूटर, लैपटॉप, बाइक सभी कुछ तो रोबोट हैं। यह सब इंसानों की बस्ती में अपना रुतबा बनाने में जुटे हैं। 

हमारे काम सीमित होते जा रहे हैं। अधिकतर समय रोबोटों के साथ बिताया जा रहा है। सऊदी अरब में इंसानों जैसी दिखने वाली रोबोट सोफिया को नागरिकता मिल गई। सऊदी अरब दुनिया का पहला ऐसा देश है, जिसने रोबोट को नागरिकता दी है। इस रोबोट ने संबोधित भी किया और सवालों के जवाब भी दिए। यह पहला कदम है और इमेजिन करें आने वाले 50 साल को, तब शायद एक शहर या राज्य या फिर किसी देश का बड़ा हिस्सा रोबोटों का होगा। 

अलग-अलग काम करने वाले रोबोट बनाने की प्रक्रिया का उद्देश्य किसी भी कार्य में एरर की गुंजाइश नहीं होने देना और कार्यबोझ कम करने की दिशा में प्रयास बताया जा रहा है। चाहे सिक्योरिटी की बात हो या फिर मेडिकल साइंस की, रोबोट का दखल होने लगा है। यानि  इन मशीनी मानवों पर पर इंसानों का विश्वास बढ़ रहा है। इनमें इंसानी इंटेलीजेंस प्रत्यारोपित किया जा रहा है। ये हमारी तरह व्यवहार कर रहे हैं और सवालों के जवाब दे रहे हैं। 

क्या स्मार्ट वर्क का मतलब खुद का इंटेलीजेंस मशीनों में शिफ्ट करके उनसे काम कराना है। क्या हम इन मशीनों से काम लेते हुए इनके आदी तो नहीं हो रहे हैं। अगर हम फोन और अन्य डिवाइस की बात करें तो यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस अब नेचुरल पर हावी होकर ज्यादा स्मार्ट हो गया है। 

अब यहां तक कहा जा रहा है कि रोबोट बनाने के इस दौर में रोबोट बनने की प्रक्रिया से कैसे बचा जाए, इसके तरीके तलाशने होंगे। यह सवाल चुनौती बना है। क्या वास्तव में हम अपने बनाए रोबोटों से घिर रहे हैं। क्या हम इन पर पूरी तरह निर्भर हो गए हैं। क्या इनकी वजह से सुकून गायब होने लगा है। क्या हमारी दिनरात की भागदौड़ इनकी वजह से और ज्यादा बढ़ रही है। 

कई बार लोगों को अपने स्मार्ट फोन से दूर भागते देखा है। कुछ लोग तो फोन उठाने से घबराने लगे हैं। यहां स्मार्ट फोन की बात इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि इसी रोबोट से सबसे ज्यादा वास्ता पड़ता है। यह हर समय साथ रहता है। यस बॉडी पार्ट की तरह विहैव करने लगा है। अक्सर सवाल उठता है कि ये हमारे रोबोट हैं या हम इनके रोबोट। मोबाइल फोन और इसके जरिये दुनिया से जुड़ने की प्रतिस्पर्धा को देखते हुए तो यहीं कहा जा सकता है। 

Sunday, 22 October 2017

चालबाज साहूकार और खूबसूरत युवती

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मैं आपसे एक कहानी शेयर कर रहा हूं, जिसमें एक युवती जीवन की सबसे बड़ी चुनौती का सामना करती है। एक तरफ उसके पिता हैं और दूसरी तरफ उससे शादी करने की जिद पर अड़ा बूढ़ा और बदसूरत साहूकार। युवती के पास केवल एक ही विकल्प है, जो उसका जीवन बचा सकता है। यह विकल्प ठीक उस लाटरी की तरह है, जिसमें किसी विजेता के नाम की पर्ची निकाली जाती है। यानि यह पूरी तरह किस्मत का खेल हो गया। युवती हिम्मत नहीं हारती और धोखेबाज साहूकार का पर्दाफाश करने का फैसला कर लेती है।  

कहानी कुछ इस तरह है-  इटली के एक शहर में एक छोटा व्यापारी रहता था। उसने अपने व्यवसाय को चलाने के लिए एक साहूकार से लोन लिया था। लोन चुकाने की स्थिति में नहीं होने की वजह से वह साहूकार के चंगुल में फंसता चला जा रहा था। उधर, साहूकार उसकी खूबसूरत बेटी से शादी करना चाहता था। एक दिन उसने व्यापारी के सामने यह प्रस्ताव रखा कि अगर वह उससे अपनी बेटी की शादी कर देता है तो बदले में वह उसका सारा लोन ब्याज सहित माफ कर देगा। इस प्रस्ताव पर व्यापारी और उसकी बेटी की चिंता बढ़ गई।

साहूकार ने व्यापारी से कहा कि मैं एक और प्रस्ताव तुम्हारे सामने रखता हूं। मैं एक बैग में काला और सफेद रंग के दो पत्थर रखूंगा। बैग में बिना देखे तुम्हारी बेटी को एक पत्थर निकालना होगा। अगर बैग से काला पत्थर निकला तो मैं तुम्हारा सारा लोन ब्याज सहित माफ कर दूंगा, लेकिन तुम्हें अपनी बेटी से मेरी शादी करानी होगी। 

अगर तुम्हारी बेटी ने बैग से सफेद पत्थर निकाला तो तब भी तुम्हारा सारा लोन माफ कर दूंगा और तुम्हें मेरे से अपनी बेटी की शादी भी नहीं करानी पड़ेगी। पिता और पुत्री इस प्रस्ताव से विचलित हो गए। व्यापारी की बेटी के सामने इस प्रस्ताव को नहीं मानने का विकल्प था, लेकिन इससे उसके पिता का कर्ज माफ नहीं हो सकता था। 

युवती ने इस समस्या का डटकर सामना करने का फैसला लिया। उसके पास दोनों विकल्प में अपने पिता का कर्ज माफ कराने का मौका तो था ही। प्रस्ताव मान लिया गया। साहूकार बैग लेकर व्यापारी के घर पहुंचा और उसके बागीचे से दो पत्थर उठाकर अपने बैग में डाल दिेए। व्यापारी की बेटी ने उसको बैग में पत्थर डालते हुए देख लिया था। ये दोनों पत्थर काले रंग के थे। व्यापारी की बेटी साहूकार की चाल को समझ गई। अब उसके पास साहूकार की करतूत का खुलासा करने का मौका था, लेकिन इससे उसके पिता का कर्ज माफ नहीं हो सकता था। इसलिए कुछ अलग करके समस्या से बाहर निकलने का प्लान बना लिया। उसने अलग हटकर कुछ सोचा। 

उसने साहूकार के बैग में से एक पत्थर निकाला और उसको जमीन पर बिखरे अन्य पत्थरों में गिरा दिया। यह देखकर साहूकार और व्यापारी दोनों चौंक गए। व्यापारी की बेटी ने कहा- अरे गलती से मुझसे वह पत्थर गिर गया। साहूकार जी, क्या आप अपने बैग में पड़े दूसरे पत्थर को बाहर निकालकर बता सकते हैं कि वह गिरा हुआ पत्थर किस रंग का था। अगर आपके बैग में काले रंग का पत्थर होगा तो निश्चित तौर पर मेरे हाथ से गिरा पत्थर सफेद ही होगा। क्योंकि बैग में आपने काला व सफेद रंग के दो पत्थर ही तो डाले थे।

साहूकार को व्यापारी की बेटी की चाल समझ में आ गई, लेकिन वह कर भी क्या सकता था। वह तो अपने बुने जाल में फंस गया था। यह तो तय था कि उसके बैग में काला पत्थर ही था। इस तरह व्यापारी की बेटी की जीत हुई। साहूकार को अपने प्रस्ताव के अनुसार उसके पिता का कर्ज भी माफ करना पड़ा और उससे शादी का इरादा भी टालना पड़ा। यह कहानी समस्या से भागने की बजाय उसको हल करने के विकल्पों पर गंभीरता और सकारात्मक दृष्टिकोण से काम करने का संदेश देती है। किसी भी कठिन समस्या को आउट ऑफ बॉक्स थिंकिंग (कुछ अलग नजरिये) से सॉल्व किया जा सकता है। यह आपको सही विकल्प ही उपलब्ध नहीं कराता, बल्कि उसको आसानी से लागू करने का तरीका भी बताता है। 

Saturday, 21 October 2017

पहल तो करिये...

एक वृद्ध महिला की कहानी अक्सर सुनने को मिलती है, जो एक तालाब के किनारे बैठकर छोटे-छोटे कछुओं की पीठ (कवच) को साफ करती है। वह यह भी जानती है कि उनका यह प्रयास दुनिया के सभी कछुओं को सुकून और राहत नहीं दे सकता। वह फिर भी नियमित रूप से तालाब पर जाकर कछुओं की पीठ पर जमा गाद और मैल को साफ करती हैं। मेरे अनुसार यही तो पहल है, जो किसी बड़े बदलाव का इंतजार नहीं करती है और न ही वह कुछ लोगों या पूरी भीड़ को अपने साथ इस मुहिम से जोड़ने में विश्वास करती है।
पहल होनी चाहिए, चाहे वह एक व्यक्ति से ही क्यों न हो। सच मानियेगा, अगर इस पहल में जरा सी भी ताकत होगी तो एक से दो, दो से तीन और तीन से चार, फिर लंबी कतार इस मुहिम में शामिल होने के लिए तैयार रहेगी। 

समुद्र पर श्रीराम सेतु निर्माण में एक गिलहरी के प्रयास की कहानी भी सभी ने सुनी होगी। यह गिलहरी भी सेतु निर्माण में सहयोग कर रही थी। वह छोटे-छोटे कंकड़ों को समुद्र में डाल रही थी, ताकि सेतु का निर्माण तेजी से हो सके। वह चाहती थी कि सेतु निर्माण जल्द से जल्द हो जाए और फिर श्री राम की सेना रावण की लंका पर आक्रमण कर दे। भगवान राम ने उसके इस प्रयास को देखा तो उनको काफी हर्ष हुआ। मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने स्नेह से गिलहरी की पीठ को सहलाया। कहा जाता है कि श्री राम की अंगुलियों के निशान आज भी गिलहरी की पीठ पर काली रेखाओं के रूप में देखे जा सकते हैं। ये सकारात्मक दृष्टिकोण से की गई छोटी से कोशिश का प्रतीक हैं।  

वृद्ध महिला वाली कहानी को आगे बढ़ाते हैं। जब वृद्ध महिला से पूछा गया कि तालाब के इन कुछ कछुओं की सफाई करने से क्या फायदा। ये तो फिर मैले हो जाएंगे और फिर अपनी पीठ पर बने कवच को भारी कर लेंगे। महिला का जवाब था कि यह बात सही है कि कुछ दिन बाद फिर इनको सफाई की जरूरत होगी, लेकिन यह सोचकर ही हम प्रयास करना बंद नहीं कर सकते। अगर मेरे इस कार्य से कुछ कछुओं को कुछ दिन के लिए ही सही, राहत मिलती है और उनकी पीठ पर लगा भार कुछ कम होता है तो इसमें नुकसान कहां है।

मुझे इनको कुछ दिन के लिए राहत देने में जिस आनंद की अनुभूति होती है, वह शायद कोई और बड़ा काम करने से नहीं हो सकती। मैं यह भी जानती हूं कि दुनिया में बहुत सारे कछुए हैं, जो अपनी पीठ पर काई और मैला लेकर जिंदगी काट रहे हैं। इन कुछ कछुओं की पीठ साफ करने से कछुओं का उद्धार होने से रहा, लेकिन पहल तो कही से होनी चाहिए थी। 

मैं यह पहल कर रही हूं। हो सकता है कि आने वाले समय में कोई इससे प्रेरणा लेकर किसी और तालाब के कछुओं को राहत देने में जुट जाए। उसके बाद कोई और, फिर कोई और... यह सिलसिला पूरी दुनिया में चल जाएगा, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। पहल तो कहीं से होनी थी, हो सकता है, यहीं से हो गई।

पूरी कहानी में कहने का मतलब है कि अगर नजरिया सकारात्मक है, तो पहल होनी ही चाहिए। भले ही एक व्यक्ति से हो या फिर पूरी टीम के साथ। सार्थक पहल ही व्यक्ति को सफलता की राह दिखाती है। यह मत सोचिए कि किसी एक व्यक्ति की छोटी सी पहल से बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं की जा सकती। कोई भी शुरुआत केवल एक आइडिया या विचार से होती है। शुरुआत किसी एक बिंदु से होती है और उसका दायरा असीमित। 

Friday, 20 October 2017

ये दाग अच्छे हैं, अगर उसको राह दिख जाए

करीब एक साल पहले मैं कुछ बच्चों को पढ़ाता था। इनमें क्लास छह का एक बच्चा ऐसा भी था, जो हमेशा कोई न कोई बहाना बनाता और महीने में दस दिन गायब रहता। सही तरह से लिखने में तो उसको मानो कोई परेशानी हो रही थी। अक्षरों की शेप बदलने में उसको आनंद आता था। अगर मैं आपको यह न बताऊं कि यह कॉपी किसी बच्चे की है, तो आप उसकी राइटिंग देखकर कहेंगे कि किसी वृद्ध ने कांपते हुए हाथ से लिखी है। मैथ से उसका बहुत ज्यादा वास्ता नहीं था। हिंदी, अंग्रेजी के क्या कहने। अपने सामने लिखने के लिए कहता, तो वह तीन लाइन लिखने में तीन पेन बदलता। उसका बाक्स पेन से भरा रहता, लेकिन एक भी काम का नहीं होता। कॉपी पर शुरू की चार लाइन लिखने के बाद दो लाइन काटी होतीं। शब्द लाइनों के बीच में होने की बजाय ऊपर नीचे टंगे रहते। 

उसकी कॉपी पर एक खास बात जो मुझे नजर आती, वह थी अक्षरों को किसी कार्टून सी शक्ल देने की कोशिश। वह कोई भी अक्षर लिखता और फिर उसको किसी ओऱ शेप में बदलने के चक्कर में पेज पर स्याही के दाग छोड़ देता। ये दाग अच्छे हो सकते हैं, अगर इस बच्चे की इस कोशिश को राह दिखा दी जाए। कॉपी के आखिरी पेज को देखा तो वहां कार्टून बनाने की कोशिश साफ नजर आती। कई तरह की आकृतियां बनाई थीं उसने। इन आकृतियों का उसके सेलेबस से कोई वास्ता नहीं था। उसके पैरेंट्स भी नहीं चाहते थे कि वह कॉपी और किताबों पर ये बेवजह की शेप उकेरे। इस बच्चे की मां से बात की तो उनका कहना था कि यह पढ़ाई में मन नहीं लगाता। इसको क्लास पास करने लायक ही बना दो। 

मैंने उसके घर के आसपास रहने वाले बच्चों से पूछा कि यह छुट्टी के दिन क्या करता है। मुझे बताया गया कि यह बच्चा घर के पास नदी और जंगल से लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़े इकट्ठे करता है या फिर खेलने में व्यस्त रहता है। घर में डांट के डर से पढ़ाई केवल होमवर्क निपटाने तक ही सीमित है। लकड़ी के टुकड़ों को काटने, छीलने में उसको आनंद आता है। मैंने इस बच्चे से बात की। उसने बताया कि उसको लकड़ी के टुकड़ों में कोई न कोई आकृति दिखती है। वह इन टुकड़ों को अपने हिसाब से लुक देना चाहता हूं, लेकिन वह यह काम नहीं कर पाता। घर में यह काम करूंगा तो पिटाई का डर है। घर के लोग हमेशा पढ़ने पर जोर देते हैं, जो मुझे अच्छी नहीं लगती। मैंने कहा कि मम्मी सही तो कहती हैं कि पढ़ाई करो। छुट्टी के दिन में आप यह काम कर सकते हो। उसने बताया कि जब उसको लकड़ी के टुकड़े काटने, छीलने से मना किया जाता है तो वह कॉपी पर अपने मन के अनुसार चित्र बनाता रहता है। मुझे पढ़ना अच्छा नहीं लगता। 

यहां एक बात मेरी समझ से परे है कि यह बच्चा कहां जाए। वर्षों पुराना एजुकेशन सिस्टम छात्र-छात्राओं को नौकरी के लिए तैयार करने वाली मशीन की तरह काम कर रहा है। स्कूल से लेकर कॉलेज तक के छात्रों के दिमाग में केवल एक बात फिट की जा रही है कि ज्यादा से ज्यादा नंबर लाकर अच्छी से अच्छी नौकरी हासिल करनी है। नौकरी वही अच्छी है, जिसमें तनख्वाह ज्यादा हो। स्पर्धा बढ़ती जा रही है और तनाव व अवसाद के मामले भी। 

क्या हम बच्चों को 12वीं और ग्रेजुएशन के बाद ही वह मौका देना चाहते हैं, जिसकी मांग उसने क्लास 6,7 मे ंरहने के दौरान की थी। क्या बच्चों की रूचि और प्रतिभा को उनके छोटी क्लास में रहने के समय ही नहीं पहचान लिया जाना चाहिए। अगर यह बच्चा लकड़ी के टुकड़ों में अपने इमेजिनेशन को दिखाना चाहता है तो उसको मौका क्यों नहीं मिलना चाहिए। यह ठीक है कि पढ़ाई भी जरूरी है, लेकिन क्या पढ़ाई पूरी करने तक इस बच्चे को अपनी रूचि वाले सकारात्मक कार्यों से दूर रखा जाना चाहिए। 

अपनी पढ़ाई के दौरान हमें क्रिएटिविटी के नाम पर आर्ट पेपर पर आम, सेब, अंगूर, साड़ी का डिजाइन, फर्श का डिजाइन, शब्दों को कलात्मक तरीके से लिखने, दो से आठ रंग वाले गोले बनाने के अलावा ज्यादा कुछ सीखने और करने का मौका नहीं मिलता था। मैं तो आर्ट और डिजाइन से दूर रहता था। मुझे कुछ न कुछ इधर, उधर की बातें लिखने का शौक था, लेकिन किसी ने मुझे कोई सलाह नहीं दी। उस समय मेरे आसपास रहने वाले लोगों को शायद नहीं मालूम था कि क्या करना चाहिेए। आज का दौर सूचना तकनीकी का है। कम से कम हम बच्चों के पैरेंट्स को सही रास्ता तो बता सकते हैं। स्कूलों को अपनी इस भूमिका से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए। इसमें सरकार का रोल भी अहम है। 

फिलहाल वह बच्चा क्लास 7 में पढ़ रहा है। ठीक उसी अंदाज में जैसे पहले था। हालांकि लकड़ियों को नई शेप और लुक देने का उसकी कोशिश स्कूल और होमवर्क के बीच दब गई है। वह अब नदी और जंगल के किनारे से लकड़ियों के छोटे टुकड़े इकट्ठे करने नहीं जाता। बहुत पहले घर के पीछे बनाई छोटी सी अनियोजित वर्कशाप को उसका इंतजार है। वह तो आज भी पहले की तरह कॉपी के आखिरी पेज पर अक्षरों को नई नई शेप देने में व्यस्त है। उसका इमेजिनेशन कागज से बाहर आकर लकड़ियों के टुकड़ों को नया लुक कब देगा, मुझे नहीं पता, शायद उसे भी नहीं। 

 

जीवन उपहार है, इसका आनंद उठाएं

एक नेत्रहीन लड़की थी। वह खुद को कोसती रहती थी। वह सबसे नफरत करती थी, सिवाय अपने एक दोस्त को छोड़कर। वह अक्सर कहती कि अगर उसको दुनिया देखने ...