Monday, 25 September 2017

दिमाग हैक कर गए ये रोबोट

जब मैं छठीं क्लास में था, तब मेरे घर पर बिजली का कनेक्शन लगा था। मुझे अच्छी तरह याद है कि घर पर बल्ब जलने की खुशी में मां ने मोहल्ले में लड्डू बांटे थे और घर- घर जाकर लोगों को यह बताने में मुझे काफी खुशी हो रही थी कि मेरा घर भी बिजली से रोशन हो गया। इससे पहले हम मिट्टी तेल (केरोसिन) से जलने वाले लैंप के सहारे थे। कई बार शीशे के लैंप को तोड़ने पर डांट भी खाई थी। बिजली हो या न हो, गर्मियों की दोपहर बिना किसी परेशानी के घर के आसपास खड़े पेड़ों के नीचे कट जाती थी। इतनी गर्मी नहीं होती थी तब देहरादून और आसपास के इलाकों में। गिनती के घर होते थे और घरों के आसपास खेत और उनके बीच से होकर निकलते रास्तों पर दौड़ना हमारा रोजाना का काम था। 1985 का जिक्र कर रहा हूं मैं।

शाम को पिट्ठू चाल या फिर चोर सिपाही जैसे खेल हमको खूब दौड़ाते थे। घर के पास ही स्कूल के मैदान में तब तक दौड़ते थे, जब तक कि थक न जाएं या घर से बुलावा न आ जाए। पुरानी बातों का जिक्र इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि हम उस समय अपने मन की जिंदगी जीते थे। बचपन को जीने का पूरा मौका मिला हमें।भले ही सुविधाएं कम थीं, लेकिन हम आज की तरह किसी गैजेट या संसाधन या फिर सेवाओं पर निर्भर नहीं थे। क्योंकि उस समय आज जैसी भौतिक सुविधाओं के आदी नहीं हुए थे या यूं कहें कि हमें इनकी लत नहीं पड़़ी थी।

सुविधाएं और सेवाएं बढ़ने के साथ-साथ हम उन रोबोटों के हवाले हो गए, जो हमारे आसपास हमेशा मौजूद हैं। सोते -जागते हम इनके हवाले हो गए। पहले रोबोट शब्द सुनते ही मानव जैसे लोहे के उस ढांचे का ख्याल आ जाता था, जिसके बारे में सुनता रहा हूं कि वो कुछ भी कर सकता है। कुछ दिन पहले रोबोटिक्स के बारे में जानने का मौका मिला था, तो मालूम हुआ कि आपके पास जो भी कुछ दिख रहा है, आपका मोबाइल फोन, कंप्यूटर, लैपटॉप, प्रिंटर, मोटर साइकिल और न जाने कितने तरह के रोबोटों से काम ले रहे हैं हम रोजाना। ये भी एक तरह के रोबोट हैं, जिनको हम अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल और कंट्रोल कर रहे हैं।

मोबाइल फोन हमेशा साथ चाहिेए, टिफिन बॉक्स भले ही न हो। मोबाइल बंद न हो जाए, चार्जर भी बैग में रहता है। कब फोन आ जाए, कहा नहीं जा सकता। नेट के बिना काम नहीं चलता अब। स्मार्ट फोन नहीं है तो क्या बिजनेस और क्या दफ्तर, सब कुछ अस्त व्यस्त। एक पल भी साथ नहीं छोड़ता यह फोन। कुछ लोगों को यह कहते सुना है कि फोन की घंटी से डर लगने लगा है। इसलिए दो दिन में ही बेल की आवाज बदल देता हूं। इसको बंद करने में ही भलाई है। जब फोन पास में नहीं रहता तो सुकून मिलता है, लेकिन डर सताता है कि कहीं कोई इंपोर्टेंट कॉल न आ जाए।  

अब आप समझ लीजिए, हमें इन रोबोट में ही जिंदगी और तरक्की दिखती है। खासकर युवाओं पर इनका नशा चढ़ गया है। इनमें से कुछ हमें कंट्रोल करने लगे हैं। सीधे शब्दों में कहें तो हम इनके रोबोट बन गए हैं और ये हमारे संचालनकर्ता। स्मार्ट फोन के फीचर्स हमें लुभा रहे हैं। सोशल मीडिया में खोने के बाद हमें यह मालूम नहीं होता कि हमारे आसपास क्या हो रहा है। एक क्लिक में दुनिया से जुड़ने वाले अपने ही घर में अकेले हो जाते हैं। दुनिया से संवाद करने की जद्दोजहद में लगे लोगों को अपने बुजुर्गों और बच्चों से बात करने का समय नहीं मिलता। 

हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट ने चौंका दिया। यह रिपोर्ट कहती है कि सोशल मीडिया पर बतियाने वालों में डिप्रेशन का रिस्क तीन गुना ज्यादा हो गया है। साइ ब्लाग में प्रकाशित रिपोर्ट में एक अध्ययन के हवाले से यह बात कही गई है। इस अध्ययन में सोशल मीडिया के 11 सर्वाधिक लोकप्रिय प्लेटफार्म- फेसबुक, यू ट्यूब, गूगल प्लस, इंस्टाग्राम, स्नैप चैट, रेडडिट, टंबलर, वाइन, लिंक्डइन और पिंटेरेस्ट के यूजर्स को शामिल किया गया था। इनमें से 7 से 11 तरह के सोशल मीडिया प्लेटफार्म इस्तेमाल करने वालों में अवसाद का जोखिम 3.1 गुना था। वहीं इनमें एंजाइटी का खतरा 3.3 गुना पाया गया।

 अध्ययन टीम को लीड करने वाले प्रोफेसर ब्रायन ए प्रायमैक के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि सोशल मीडिया और अवसाद में सहसंबंध बताने के लिए यह काफी है। चिकित्सक अपने रोगियों से उनके कई तरह के सोशल मीडिया प्लेटफार्म इस्तेमाल करने के बारे में पूछ सकते हैं। वो उनको बता सकते हैं कि सोशल मीडिया का लगातार इस्तेमाल भी इनके लक्षणों मे ंहो सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि हम अपने अध्ययन से यह नहीं बता सकते कि क्या उदास और चिंतित लोग सोशल मीडिया के कई प्लेटफार्म को इस्तेमाल करते है या नहीं। यह भी हो सकता है कि कई तरह के प्लेटफार्म पर यूजर्स होने से अवसाद और चिंता हावी होते हैं। लेकिन इन दोनों तरह के ही नतीजों को उपयोग में लाया जा सकता है। 

Tags: #Robotics, #Socialmeadia, #Psyblog, #Dipression, #facebook

Sunday, 24 September 2017

आपकी रसोई में पहुंचेंगे हीट के बंडल

आने वाले 50 साल में ऑक्सीजन की तरह जीने के लिए इंटरनेट डेटा की जरूरत भी होगी।  फिर एक स्लोगन होगा- डेटा चाहिए तो एन्वायन्मेंट को स्वच्छ रखो, ताकि बिना किसी बाधा के घर और दफ्तर के कामकाज किए जा सकें। वाटर, इलेक्ट्रीसिटी की तरह डेटा सप्लाई भी अहम जरूरत बन जाएगा । सरकार डेटा प्रबंधन और उसकी फिजूलखर्ची की मॉनिटरिंग करेगी। डेटा फ्री में होगा, लेकिन इसको बचाने के लिए एन्वायरन्मेंट को बनाए रखना भी जरूरी होगा।

साफ पर्यावरण से नेट डेटा मिलेगा। अगर स्पीड चाहिए तो गांवों की ओर दौड़ लगानी होगी, क्योंकि वहीं स्वच्छ वातावरण मिलेगा और नेट की स्पीड भी तेज होगी। डेटा बहुत जरूरी हो जाएगा, क्योंकि इसके बिना दफ्तर तो क्या घर का कोई काम भी नहीं हो सकेगा। डेटा पर निर्भरता इस तरह होगी कि किचन में स्टोव से लेकर हर टूल नेट पर निर्भर हो जाएगा।

आपका सवाल होगा कि स्टोव और इंटरनेट का क्या संबंध। हम बताते हैं कि स्टोव जलाने के लिए गैस की सप्लाई सिलेंडरों और पाइप लाइन से नहीं होगी, तब डेटा का जमाना होगा और डेटा ही स्टोव को हीट देगा। 
यह हीट कहां से आएगी। इस सवाल का सीधा सा जवाब है, जैसे आपके मोबाइल और कंप्यूटर स्क्रीन तक इंटरनेट डेटा अपनी पहुंच बनाता है, उसी तरह स्टोव तक हीट के बंडल भी पहुंचेंगे। 


हीट के बंडल को स्टोव से लिंक करने में इंटरनेट डेटा और गैस कंपनी से मिले पासवर्ड की जरूरत होगी। पासवर्ड फीड करते ही स्टोव काम करना शुरू कर देगा। पानी और बिजली की सप्लाई भी पासवर्ड से होगी। हां, हीट के बंडलों का पेमेंट करना होगा। सबसे खास बात यह कि ये हीट पैकेट पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे।

सबकी जिंदगी इंटरनेट डेटा पर डिपेंड हो जाएगी और डेटा स्वच्छ पर्यावरण के बिना मिल नहीं सकेगा। ऐसे में पर्यावरण को साफ करने में दिन रात एक कर दिया जाएगा। सभी अपने घरों और आसपास पर्यावरण को साफसुथरा बनाने में जुटे होंगे। इसलिए स्वच्छता का अभियान चलाने की जरूरत ही नहीं होगी और न ही स्वच्छता को कोई अपनी सियासी ताकत बनाने की कोशिश कर रहा होगा। अघोषित तौर पर ही सही, स्वच्छता के बिना न वाटर सप्लाई होगी, न ही इलैक्ट्रीसिटी मिलेगी और न ही खाना पकाने के लिए गैस घर तक पहुंचेगी, क्योंकि सब तो डेटा पर डिपेंड होगी और डेटा साफ सफाई पर।  ( तकनीकी दुनिया पर लिखी जा रही किताब का एक अंश)


Saturday, 23 September 2017

मिलो से मिलेंगे तो बहुत आगे बढ़ेंगे

कोई भी व्यक्ति एक दिन, दो दिन या एक माह या एक वर्ष में महान नहीं बनता। कोई भी कार्य तब तक कठिन है, जब तक कि हम उसको करने का प्रयास नहीं करते। प्रयास करना एक पहल हो सकता है, लेकिन उस दिशा में निरंतर अभ्यास करना यानि उसके प्रति खुद को समर्पित कर देने का मतलब है सफलता की गारंटी।

यहां मैं एक बहुत पुरानी कहानी का जिक्र कर रहा हूं, जो हर आयु के व्यक्ति के जीवन में बदलाव लाने वाली साबित होगी। मैं तो ऐसा मानता हूं। मुझे यकीन है कि आप भी ऐसा मानोगे। बच्चों और युवाओं से अक्सर यह कहानी शेयर करता हूं। कुछ लोग इसमें रुचि लेते हैं और कई इसको एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल भी देते होंगे। यह कहानी बहुत सारे लोगों ने पढ़ी और समझी होगी और इसको अपने जीवन में उतारा भी होगा। हमारे आसपास भी ऐसे बहुत लोग मिल जाएंगे, जिन्होंने लगातार अभ्यास के दम पर अपने विषय पर महारत हासिल की है।

ग्रीस के महान शक्तिशाली रेसलर मिलो ने लगातार छह ओलंपिक में कई मेडल अपने नाम किए थे। मिलो शक्तिशाली रेसलर थे। उनके प्रतिद्वंद्वियों में उनकी ताकत की चर्चा होती थी। वो सोचते थे कि मिलो इतने शक्तिशाली कैसे हो गए। ऐसा क्या है मिलो में, जो जीत पर जीत हासिल करते हैं। अभ्यास तो वो भी करते हैं, मिलो में ऐसी क्या खास बात है। 

मिलो की शक्ति के पीछे एक प्रेरणास्पद अभ्यास छिपा है, जो कहता है कि लगातार प्रयास करने से बड़े से बड़े टास्क को आसान किया जा सकता है। इसके लिए नियमित तौर पर अभ्यास की जरूरत है। कहानी में जिक्र किया गया है कि मिलो ने अपनी शक्ति बढ़ाने का अभ्यास नवजात बछड़े को कंधों पर उठाने से शुरू  किया था। वाकई यह उनके के लिए आसान था। उनका कहना था कि वो एक बछड़े को आसानी से उठा सकते हैं, आप क्यों नहीं। 

इस पर आप कहेंगे, एक छोटे से बछड़े को कंधे पर उठा लेना कौन सी बड़ी बात हो गई। यह तो बड़ा आसान काम है। मैं भी यही कह रहा हूं कि मिलो ने जो शुरुआत की और बाद तक इसको लगातार दोहराते रहे, वो बड़ा काम नहीं था। यहां अगर कोई बड़ा काम था तो वो उनकी अपने कार्य को लेकर लगन, निष्ठा, समयबद्धता और अनुशासन। ये सभी बातें उनकी ताकत को बढ़ाने, उनको हर रेसलिंग में विजय दिलाने में बड़ा महत्वपूर्ण और सकारात्मक योगदान अदा करती रहीं। 

फिर से मिलो की कहानी पर आते हैं। मिलो उस बछड़े को जब भी समय मिलता, कंधे पर उठा लिया करते थे। रोजाना दिन में कई बार वह ऐसा करते थे। यह सब बड़ी आसानी से चल रहा था।  जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी एक बड़े बुल( सांड) को कंधों पर उठाने का प्रयास करते रहे। वे लोग मिलो पर हंसते थे कि वो बछड़े को कंधे पर उठा रहे हैं। लेकिन मिलो ने अपने नियमित अभ्यास को नहीं छोड़ा और समय के साथ बछड़ा बड़ा होता गया और साथ ही उसको उठाने की मिलो की क्षमता भी बढ़ती गई।

आखिरकार एक दिन ऐसा भी आया, जिस दिन मिलो ने उस भारी सांड को कंधे पर उठा लिया, जो कभी बछड़ा था। लगातार अभ्यास ने मिलो की ताकत को बढ़ा दिया। लेकिन उनके प्रतिद्वंद्वी सांड को ही उठाने का प्रयास करते रहे। कभी वे उसे उठाने में सफल भी हो जाते थे, लेकिन वो मिलो की तरह सर्वश्रेष्ठ ताकत हासिल नहीं कर पाए।

यहां कहने का मतलब है कि किसी भी कार्य को करने के लिए एक प्रक्रिया को अपनाना होता है, इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए सब्र के साथ लगन और जुझारूपन भी होना चाहिए। यह ठीक उसी तरह है, जैसे नौ की टेबल तक पहुंचने के लिए दो से लेकर आठ तक की टेबल का अभ्यास करना जरूरी है। यदि आप क्रमबद्ध तरीके से कोई कार्य नियमित अभ्यास के साथ करोगे तो उससे जुड़े कठिन हिस्सों पर भी सफलता हासिल कर सकोगे। यानि गुणा और भाग से पहले आपको टेबल, जोड़ और घटाव के सवालों की प्रैक्टिस करनी जरूरी होती है। 

यह जान लेना हम सबके लिए जरूरी है कि पहली, दूसरी और तीसरी..... सीढ़ी पर चढ़ते हुए ही हम छत पर पहुंच पाएंगे। अगर पहली के बाद सीधे तीसरी और फिर पांचवी या 12वीं सीढ़ी पर चढ़ने का प्रयास होगा तो नुकसान ही भुगतान पड़ेगा, सफलता और दूर होती चली जाएगी। इसलिए लगातार अनुशासित तरीके से अभ्यास करने के साथ समयबद्ध प्रक्रिया का पालन भी करना होगा। 

Friday, 22 September 2017

POSTMORTEM: खूंटे पर बंधी रस्सी को तोड़ना ही होगा...

POSTMORTEM: खूंटे पर बंधी रस्सी को तोड़ना ही होगा...: एक वर्ष पहले तक मैं खुद को कोसने और फिर दिनरात की भागदौड़ में व्यस्त पा रहा था। मैं सोच रहा था कि इसके आगे जिंदगी नहीं है और जिस उम्र से हो...

खूंटे पर बंधी रस्सी को तोड़ना ही होगा...

एक वर्ष पहले तक मैं खुद को कोसने और फिर दिनरात की भागदौड़ में व्यस्त पा रहा था। मैं सोच रहा था कि इसके आगे जिंदगी नहीं है और जिस उम्र से होकर मैं गुजर रहा हूं, वहां जोखिम उठाने की सभी संभावनाएं लगभग समाप्त हो जाती हैं।

यही जीवन है और वो सब ढोते जाओ, जो भी जरूरी और गैरजरूरी तुम पर लाद दिया जाता है। मै जानता था कि यहां जोखिम उठाने का मतलब खुद और परिवार की जिम्मेदारियों को मझधार में डालना। बात सही भी थी, घर-परिवार और दोस्तों से मशविरा में भी ऐसा कुछ हासिल नहीं हो सका, जो मुझे समाधान की ओर ले जाए।

मैं ठीक उस विशालकाय हाथी जैसी स्थिति में हो गया था, जिसका एक पैर छोटी सी रस्सी से बंधा था और जिसने समझ लिया था कि वो बंधनमुक्त नहीं हो सकता। उसने अपने मन और मस्तिष्क में यह बात अच्छी तरह चस्पा कर ली थी कि बचपन से लेकर आज तक इस खूंटे से आजाद नहीं हो सका तो अब इस उम्र में इस रस्सी को तोड़कर जाने का जोखिम क्यों उठाऊं।

 वह अपनी जगह सही था और मेरे जैसे लोग अपनी जगह। सबके अपने -अपने तर्क हैं। उस हाथी से बात की जाए तो वो स्वयं को पुख्ता साबित करने के लिए तमाम तर्क गढ़ेगा और मुझे कहा जाए तो मैं अपने पक्ष को मजबूत बनाऊंगा।

मैं उस समाज और परिवार का हिस्सा हूं, जहां नौकरी मिल जाने का मतलब होता है, परिवार और अपने समाज के प्रति जीवनभर की फर्ज अदायगी। हर माह तनख्वाह से परिवार की जिम्मेदारी निभाना और फिर माह के अंत तक कुछ बच गया तो ठीक, नहीं तो अगला वेतन तो आना ही है।

 माहभर का खर्च ओवरफ्लो होने का मतलब अगली तनख्वाह में एडजस्टमेंट। यह सिलसिला माह दर माह चलता रहता है। इसलिए वेतन से घर चलने की गारंटी रहती है। सब कुछ ठीक ठाक चलता रहे तो फिर कुछ नया करने की बात पर क्यों सोचा जाए।

मैं यहां अपनी बात खत्म करता हूं और हाथी वाले किस्से पर आता हूं। हो सकता है कि कुछ लोगों के लिए यह किस्सा प्रेरणा वाला हो और कुछ के लिए फिजूल की बात। एक व्यक्ति रोजाना उस रास्ते से होकर गुजरता था, जहां एक विशालकाय हाथी का पैर एक छोटी सी रस्सी से बंधा दिखता था।

अगर हाथी चाहता तो उस रस्सी को एक झटके में तोड़ सकता था, लेकिन वो अपनी दुनिया में मस्त होकर उस पैर को आगे पीछे तो करता, लेकिन रस्सी को झटका नहीं दे रहा था। यह नजारा देख वो व्यक्ति यह सोचता रहा है कि क्या हाथी इस बंधन से मुक्त नहीं होना चाहता।


क्या वो नहीं जानता कि रस्सी को जरा सी कोशिश में तोड़कर हमेशा के लिए आजाद हो सकता है। क्या इस तरह रहने की इस हाथी को आदत हो गई है और वो इसी हालत में खुश रहना सीख गया है। क्या वो अपने महावत से डरता है। क्या उसके भीतर यह डर पैदा हो गया है कि वो यह रस्सी तोड़कर यहां मिले भोजन पानी के लायक भी नहीं रह पाएगा। क्या वो जीवन में दो समय के खाने पीने के अलावा और कुछ नहीं सोचता।

एक दिन वो व्यक्ति  हाथी के महावत से यह सवाल पूछ लेता है कि  एक छोटी सी रस्सी ने इतने बड़े असीमित ताकत वाले हाथी को काबू में कर रखा है। इसका राज क्या है। महावत से जो जवाब मिला, वो हमारे आसपास मौजूद तमाम लोगों पर लागू हो रहा है।

महावत ने बताया कि यह रस्सी बचपन से इसके पैर में बंधी है। इसके दिमाग में यह बात बैठ गई है कि वो इस दायरे से बाहर नहीं निकल सकता और यही कारण है कि इसने कभी प्रयास भी नहीं किया। इसलिए यह इसी खूंटे पर बंधा रहकर जिंदगी गुजार रहा है।

इस पूरे वाकये का यह मतलब यह कतई नहीं निकाला जाए कि नौकरी करना, ठीक किसी खूंटे पर बंधने जैसा है। नौकरी करने के दौरान ही बहुत सारे लोग, कुछ ऐसा करके भी दिखाते हैं, जो सबसे अलग हो। यह सब कहने का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि अगर जीवन में कुछ नया करना चाहते हो, तो खूंटे की रस्सी को तोड़ने का जोखिम तो उठाना ही पड़ेगा।

लेकिन इससे पहले अपनी ताकत को पहचान लीजिए कि आप क्या कर सकते हैं। अगर वर्षों से करते आ रहे कोई काम तकलीफ देता है, तो उसमें नयापन लाने की कोशिश करें। चाहे नौकरी हो या पढ़ाई हो या फिर बिजनेस या फिर कोई और विधिक पेशा, सब जगह कुछ न कुछ नयापन होना जरूरी है।

परंपरागत तरीके से हो रहे काम से कुछ तो बाहर आना होगा। आज तमाम ऐसे अभिनव प्रयोग हमारे सामने आ रहे हैं, जो प्रेरित करते हैं। हम उनको जानकर बोल उठते हैं कि वो कर सकते हैं, हम क्यों नहीं। उम्मीद है कि आप करेंगे कुछ नया, जो किसी खूंटे की रस्सी के दायरे से बाहर आने जैसा ही होगा....।







Monday, 26 June 2017

मैं टूट गई तो जिंदगी रूठ जाएगी


जब तक मैं हूं , इंसान तो क्या जानवर भी अपने होने का अहसास कराता है। जिस दिन, मैं टूट गई, कई लोगों की जिंदगी रूठ जाएगी, क्योंकि मैं जानती हूं वो मेरे सहारे ही जी रहे हैं। पूरा दिन बीत गया, शाम आ गई और फिर रात का अंधेरा। मैं उनके दिलों और अरमानों को रोशनी देने का काम करती हूं। उनके लिए एक और नई सुबह फिर से कुछ नया करने का भाव जगाती है कि आज तो कुछ अच्छा होगा।नई सुबह, नया उजाला और अरमान पूरे करने के लिए एक नई पहल, यह सब सोचते हुए फिर दिन, शाम और रात का खलल। मैं फिर भी तुम्हें एक और नई सुबह के लिए प्रेरित करती हूं और हमेशा करती रहूंगी, क्योंकि तुमने मुझे अपने भीतर, अपने दिल और दिमाग में जगह जो दी है। 

इसलिए मैं तुम्हारा हरदम साथ निभाऊंगी, क्योंकि जब तुम्हें मुझसे लगाव है तो मेरा भी कुछ फर्ज बनता है और मैं तुम्हें जिंदा रखूंगी, तुम्हारे लिए नहीं बल्कि अपने और तुम्हारे अपने लोगों के लिए। मेरे होते अगर वो तुम्हें खो बैठे, तो मेरे पर से दुनिया का विश्वास उठ जाएगा। लोग कहेंगे कि अब तुम्हारे सहारे कौन और क्यों जीना चाहेगा। तुम तो धोखा दे रही हो। जो हम सोचते और करने की कोशिश करते हैं, तुम्हारे धोखे की वजह से कभी कुछ नहीं हो पाएगा। अगर तुम वाकई धोखा देती है तो लोग इंतजार भी नहीं करेंगे और दम तोड़ बैठेंगे। 

क्या तुम जानते हो कि मेरे सहारे दुनिया टिकी है, चाहे कोई राजा हो या रंक। इसलिए तो लोग कहते हैं कि उम्मीद कभी खत्म नहीं होनी चाहिेए। उम्मीद है कि सब कुछ ठीक हो जाएगा। बड़ी उम्मीद के साथ आपके पास आया हू्ं। मुझसे उम्मीद है कि तुम मेरा साथ दोगे। मैं हमेशा संघर्ष में साथ देती हूं। मैं जीने का भाव जगाती हूं। मैं वो ऊर्जा हूं जो कमजोर हालातों में आपमें कुछ कर गुजरने का जज्बां पैदा करती हूं। मेरा बखान, कोई कोरी कल्पना या शब्दों का जाल नहीं है, बल्कि यह इंसानों के अनुभव का सारांश है।

जब सब कुछ अच्छा नहीं था। दिनरात की दौड़भाग में शरीर बगावत करने लगा और मेरे खिलाफ लड़ाई में उसने डायबिटीज, हायपरटेंशन और हाईबीपी से हाथ मिला लिया। शरीर चाहता था कि उसको आराम दूं औऱ उसके लिए काम करूं। जिम्मेदारियों को निभाने के लिए आगे बढ़ना जरूरी था, पर शरीर मना करने लगा। डर यह भी था कि शरीर की बगावत और आसपास की साजिश सफल हो गई तो मेरा तो अस्तित्व खत्म हो जाएगा।

बड़ा फैसला कर लिया कि अब उस काम को ही छोड़ दिया जाए, जिसकी वजह से सब कुछ उल्टा हो रहा है। क्या आप जानते हैं कि मैंने अपनी आजीविका का एक मात्र जरिया नौकरी छोड़ने का बड़ा फैसला ले लिया। मेरे पास कोई काम नहीं था, लेकिन मुझे उम्मीद थी कि मैं कुछ नया कर लूंगा, जिससे मेरा शरीर और आसपास के लोग खुश रह सकें। जब आप जिनको अपना समझते हैं, वो ही आपके सामने बागियों सरीखी भूमिका में हों, तो यकीन मानिये आपके खिलाफ पनप रहा माहौल आप पर भारी पड़ सकता है। यही कुछ शरीर को लेकर मेरे साथ था।

लेकिन मैंने जिस माहौल में नौकरी छोड़ी, वो बड़ा कष्टदायक था। मैंने सबके सामने जिन शब्दों का सामना किया, वो कभी सोचे नहीं थे। कोई 20 साल की बेदाग सेवा पूरी करने के बाद ऐसा कुछ सुने और लोगों को सुनने का मौका दे, इससे ज्यादा बुरा किसी इंसान के लिए नहीं हो सकता। इंसनों से इतर कोई और हो तो मैं नहीं कह सकता लेकिन मैं नहीं सुन सकता था। सच मानिये, दिल कर रहा था कि अभी जोर-जोर से रोकर इस अपमान से पैदा हुए मैल को धो डालूं।

 मैंने ऐसा कोई अपराध नहीं किया था, जिसकी मुझे सरेआम अपशब्दों के जरिये सजा दी गई। लेकिन उम्मीद के सहारे पैदा हुए साहस ने मुझसे कहा- रोने का नहीं बल्कि किसी नई शुरुआत का वक्त है। जागो और आगे बढ़ो। सच मानिये इंसान होने के नाते बहुत दुख हुआ था, लेकिन उम्मीद ने मेरे भीतर उन सभी वजहों को एकजुट कर दिया, जो मुझे सकारात्मक तरीके से जीने में मदद कर रहे हैं।

एक बार तो लगा कि 43 साल की आयु में फिर से वहीं आकर खड़ा हो गया, जहां 23 साल की उम्र में था। अब तो तेरे ऊपर जिम्मेदारियां हैं, तब ऐसा कुछ नहीं था, क्या करेगा। यह नकारात्मक विचार एक नहीं कई बार दिलोदिमाग को झकझोरने लगे। लगा कि दुनिया छोड़ दूं, फिर अपनी जिम्मेदारियों का ख्याल आया और एक बार फिर उम्मीद मेरे कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हो गई।

आज नौ माह बाद मैं लगभग उसी मुकाम पर पहुंच गया हूं, जहां पहले था। मुकाम का मतलब उस रकम से है, जो मुझे नौकरी में तनख्वाह से मिलती थी, लेकिन सुकून नहीं था। टेंशन के दौर से बाहर आकर अपनी जिंदगी जी रहा हू्ं। मैंने शुरुआती छह माह तकलीफें झेलीं, लेकिन मैं और मेरा परिवार इसके लिए पहले से मानसिक तौर पर तैयार था और रोजाना सुबह एक उम्मीद के सहारे उठते थे कि आज शाम तक कुछ अच्छा हो जाएगा। 

शाम को ट्यूशन पढ़ाने के लिए दूरस्थ गांव में इस उम्मीद के साथ जाता था कि शायद आज कुछ और नये बच्चे ट्यूशन क्लास में दाखिला ले लें। शुरू में दो और फिर दो-दो करते मेरे पास 30 बच्चे ट्यूशन के लिए  आने लगे। मैंने ट्यूशन का समय बढ़ा दिया और इस उम्मीद से और मेहनत करने लगा कि अगले सत्र में बड़़े स्तर पर ट्यूशन सेंटर शुरू करूंगा। मैंने घर-घर जाकर भी ट्यूशन पढ़ाई। हालांकि बाद में मुझे एक सांध्य अखबार और वेबसाइट आपरेशन का काम मिल गया।

 वहां से आजीविका चल रही हैं और कुछ और नया करने के लिए वक्त मिल गया। आज अपना न्यूज पोर्टल भी चला रहा हूं और उम्मीद है कि मेरे पास मौजूद यह सब काम मुझे तरक्की की ओर ले जा रहे हैं। साथ ही शरीर अब बगावत नहीं कर रहा है और मैंने डायबिटीज को बाय-बाय कह दिया है। औरों की खींची गई लाइन को बिना मिटाए छोटा करने में लगा हूं, क्योंकि मैं अब उम्मीदों के सहारे लंबी लाइन खींचने में जो लगा हूं। इसमें उन लोगों ने मेरा साथ दिया है, जो वाकई उन्नतशील सोच और सकारात्मक व्यवहार के धनी हैं।

मैंने यह कहानी इसलिए साझा नहीं की कि मैं बहुत दलेर व्यक्ति हूं, जो बुरे वक्त से नहीं घबराता। मैं ऐसा कतई भी नहीं हूं, लेकिन मेरा सकारात्मक पक्ष है- उम्मीदों को कभी भी नहीं खोना। उनके सहारे आज, कल और फिर कल प्रयास करते रहना। एक दिन आपका होगा। उम्मीद मत खोना दोस्तो, यह जीना सिखाती है सफल बनाती है। 

सौ दिन में नारे ही लगा रही उत्तराखंड सरकार

  • उत्तराखंड के दूर गांव से सरकार को चिट्ठी
मैंने तो सुना था कि सरकार को कुछ करना हो तो निर्णय लेने की भी जरूरत नहीं होती और न ही ढोल बजाने की, काम होते ही दिखने लगता है। मैं तो ठहरा पहाड़ के दूरदराज का शख्स, मुझे तो सूचनाएं भी देरी से मिलती हैं। सौ दिन हो गए नई सरकार को, यह भी मुझे कहीं से मालूम पड़ा। मुझे यह भी पता चला है कि इस सरकार ने सौ दिन में वो सभी काम कर दिेए, जो पहले कभी नहीं हुए, सरकार के लोगों ने ही ऐसा कुछ बताया है। पहाड़ पर रेलगाड़ी तो मैं पहले भी सुन रहा था, पर आज नई सरकार से मुझे जानकारी मिली है कि वो ऐेसा करा रही है। यहां के खास स्थानों को रेल से जोड़ने का काम उसने ही शुरू कराया है और अब रेल को कर्णप्रयाग से बदरीनाथ धाम और सोनप्रयाग तक बढ़ा देगी। मैं भले ही दूर रहता हूं पर मुझे मालूम है कि यह काम यहां की नहीं बल्कि दिल्ली की सरकार ने किया होगा। ये ट्रेन को पहाड़ पर चढ़ाने में उनकी मदद कर दें तो भला होगा। मुजफ्फरनगर से देवबंद तक रेल लाइन बिछाने का काम भी दिल्लीवालों का ही है। हुजूर आप बता दो इसमें आपने क्या किया।
हम तो उत्तराखंड बनने के बाद से आज तक अपने बच्चों के लिए कुछ कामकाज मांग रहे हैं। पिछली सरकार ने 30 हजार नौकरियां देने की बात कही थी, पर मेरे बच्चे को तो कुछ नहीं मिला। वो आज भी देहरादून में पार्ट टाइम करके किसी तरह गुजर बसर कर रहा है। मैंने उसे कह दिया है कि अगर कुछ कमा सके तो अपने लिए कर ले, मुझे यहां मेरे हाल पर छोड़ दे। रोज उसकी राह देखता हूं, कब आएगा। मुझे मालूम है कि मेरे पास आने के लिए उसको छुट्टी चाहिए, जो पार्ट टाइम में नहीं मिलती। आप ने देहरादून में कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय का क्षेत्रीय कार्यालय खोलने     को अपने सौ दिन में जोड़ दिया। यह तो दिल्लीवालों का कमाल है। आपको तो तब मानेंगे, जब मेरा बच्चा भटकने की बजाय कुछ कामधंधा करने लगा। मुझे किसी दफ्तर से नहीं, रोजी रोटी से मतलब है सरकार। दफ्तर तो अफसरों के लिए है, जहां वो प्लानिंग करेंगे और बहुत सारे काम होंगे, भले ही वो मेरे गांव तक दिखें या नहीं। अगर दिखेंगे तो मान लूंगा कि आपने कुछ अच्छा कर दिया।
एडीबी से पावर सेक्टर के लिए 819.20 करोड़ के लोन की सैद्धांतिक स्वीकृति आपको केंद्र सरकार से मिल गई। लोन कब मिलेगा और काम कब होंगे, यह तो वक्त बताएगा। फिलहाल इसको सौ दिन में गिनाकर आपने अपना काम चला लिया। ऐेसा आपने ही नहीं किया, पहले भी बिजली के तमाम काम पर करोड़ों खर्च हो गए। मुझे इसका फायदा इसलिए नहीं मालूम, क्योंकि मेरे यहां आंधी, तूफान और तेज बारिश में जाने वाली बिजली बड़ी मुश्किल से लौटकर आती है।
आपने बताया कि देहरादून, हल्द्वानी और हरिद्वार को जल्द रिंग रोड मिल जाएगी। गढ़वाल और कुमाऊं को जोड़ने के लिए कंडी रोड खुलेगा।यह भी पहले से सुनते आ रहे हैं। हुजूर यह आप करा रहे हैं तो अच्छी बात है, पर सुना है हरिद्वार से लेकर देहरादून तक सड़क चौड़ी करने के काम में सरकार के कम, लोगों के पसीने ज्यादा छुट रहे। जब हो जाएगा, तभी इसे अपना काम बताना, तो जनता पर ज्यादा प्रभाव जमेगा।
यहां तो कुछ उल्टा ही दिख रहा है, दिल्ली वालों ने आपकी सल्तनत की 22 सड़कों को राष्ट्रीय हाईवे बनाने की बात मंजूर कर ली। यह कैसे हो सकता है, आपको तो नेशनल हाईवे को जिला मार्ग बनाने में विकास नजर आता है। यह राज्य की भलाई के लिए है तो वो क्या था, जब आपने कई राष्ट्रीय हाईवे को जिला मार्ग बनाने का फरमान सुना डाला था। अच्छा समझ में आ गया वो भी राजस्व बढ़ाने के लिए था, शराब से। यह भी आपके सौ दिन की बड़ी सौगात है साहब, इसको भी गिना दीजिए। चलिये लोकल ठेकेदारों का भला हो जाएगा, उनको पांच करोड़ तक के काम मिल जाएंगे। इसे आप स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बताते हैं तो अच्छी बात है।
आपने सौ दिन में एक काम और बढ़िया कर दिया वो जनता के विभागों को नियमित बजट के अलावा 250 करोड़ अलग से दे दिए, ताकि छोटे-छोटे कार्यों के लिए उनको बजट की कमी न हो। मेरी एक बात का जवाब दे दो। मुझे पता चला है कि ये वो विभाग हैं, जिनके पास इतना पैसा होता है कि ये साल के आखिर में बहुत सारा लैप्स कर जाते हैं। अगर सरकार इस पैसे का हिसाब लेगी तो यह भी तय किया होगा, कि जनता की कौन सी मांग पूरी करने के लिए पैसा दिया है। नहीं तो फिर लैप्स कर जाएंगे या फिर….।
क्या डॉक्टरों को पहाड़ पर भेजकर ही स्वास्थ्य सेवाएं सुधरेंगी। जब भी हेल्थ की बात करो, सरकार कहती है कि डॉक्टरों की भर्ती कर रहे हैं। मैदानों में तैनात डॉक्टरों को पहाड़ पर भेजा गया है। यह कसरत पहले भी हुई, हाल जानते हैं हमारे गांवों का। चिकित्सा चयन बोर्ड 200 डॉक्टर भर्ती करेगा। अस्पतालों और डिस्पेंसरियों की हालत भी सुधार दो। आपने तो यह भी नहीं बताया कि कब डॉक्टर भर्ती होंगे और कब मेरे गांव में इनमें से कोई दिखेगा।
सीमांत औऱ छोटे किसानों को दो प्रतिशत ब्याज पर लोन देंगे, पर यह नहीं बताया कि इस पैसे से मुझे क्या करना होगा। मेरी फसल खेत से मंडी तक कैसे पहुंचेगी। मेरे जैसे तमाम गांव सूनेपन का अहसास करते हैं और आप कहते हैं कि एक लाख किसानों को स्वरोजगार से जोड़ेंगे। पहाड़ के अंतिम व्यक्ति को सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के नारे बहुत लगे हैं। आप जानते हैं कि नारों से पेट नहीं भरता, रोजी-रोटी चाहिए। हम यह सबकुछ फ्री में नहीं मांग रहे, हम मेहनतकश लोग हैं। सरकार के भरोसे नहीं बल्कि अपनी जीवटता के सहारे जीते हैं।
2022 तक हर बेघर को घर देंगे, अच्छा चुनावी नारा है। साथ ही यह भी बता देते कि यह घर कैसे मिलेगा। 2019 तक बिजली दोगे। उज्ज्वला से छूटे बीपीएल को गैस कनेक्शन देंगे। पटवारियों के 1100 पदों  के साथ अन्य पदों पर नियुक्तियां करेंगे। उच्च शिक्षा में लोक सेवा आयोग की बजाय उच्च शिक्षा चयन आयोग के जरिये नौकरियां दोगे। एक और आयोग बना दिया। पशुपालन विभाग में सौ पदों पर भर्ती होगी। यह तो घोषणाएं हैं, मुझे इनमें उपलब्धि नहीं दिखती।
यूपी से संपत्तियों  के लिए आपके अफसर बैठकों पर बैठकें करके समाधान ही तलाश रहे हैं। सौ दिन हो गए, पर कुछ नहीं मिला। आगे क्या होगा, पता नहीं। जब कुछ मिला ही नहीं तो काहे की उपलिब्ध। जहां तक उम्मीद की बात है, वह तो 17 साल से बरकरार है। आपके बाद किसी और से उम्मीद रख लेंगे, पहले भी तो ऐसा ही किया है।
आपने ठीक किया विवादास्पद यूपी राजकीय निर्माण निगम को राज्य में निर्माण के लिए प्रतिबंधित कर दिया। जब बात जीरो टॉलरेंस की हो ही रही है तो उनको भी सुधार दीजिए, जिनकी वजह से यह कदम उठाना पड़ा। जनता तब मानेगी, जब आप विवादास्पद निगम के दोषियों को सरेआम कर दोगे। एनएच 74 मुआवजा मामला तो एक बानगी है, यहां तो और भी हैं, जिनको सामने लाना जरूरी है। चाहे आपदा राहत का मामला हो या फिर एनआरएचएम दवा घोटाला या फिर जल संस्थान के बाइकों से भारीभरकम पाइप ढुलवाने का कमाल हो, खनन माफिया का जोर हो, ऐसे और भी तमाम काम हैं, जिनमें आपके जीरो टॉलरेंस की जरूरत है।
एनआईएफटी, सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजी और हॉस्पिटैलिटी यूनिवर्सिटी आपकी उपलब्धि नहीं हैं। यह केंद्र सरकार की सौगात हैं। आईटी पार्क, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट भी आपकी सरकार की देन नहीं हैं। आपने अभी कोई सौगात नहीं दी, बल्कि घोषणाएं की हैं। घोषणाएं तब ही उपलब्धियों में गिनाने लायक होती हैं, जब वो धरातल पर आकर लोगों को भला करें। हुजूर, आपने क्या किया, यह तो बता देते।