बड़े दबाव में हैं शहर

सूरज की किरणों ने जैसे ही धरती को छुआ, हर कोई जाग उठा। धीमी आवाज तेज होती चली गई और फिर दौड़ने लगे शहर, गांव और जंगल। नेचर को अपनी सभी कृतियों से स्नेह है, चाहे वह धरती हो या उस पर जन्म लेने वाले इंसान या फिर किस्म-किस्म के जीव, जंतु, पेड़-पौधे, नदियां, ताल और सागर। उसने तो धरती, समुद्र और पहाड़ों की रचना की थी। 

एक समय धरती पर वनों का राज था और इंसान भी उसी में रहते थे। इंसानों ने वनों को काटकर अपनी बस्तियां बसा लीं। फिर इनसे गांव और धीरे-धीरे शहर का आगमन हो गया। जो थोड़ा आगे बढ़ा और आधुनिक होेने लगा, उसे शहर कहा जाने लगा। जो अभी भी प्रकृति के साथ रचा बसा था, वह गांव कहा जाता था। जो बलिदान देकर इन दोनों के जन्म का साक्षी रहा, वह जंगल था और आज भी वैसा ही दिखता है, जैसा पहले था।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है। अपने इस नियम को ध्यान में रखकर प्रकृति ने जंगल से गांव और गांव से शहर बनने को परिवर्तन ही माना। लेकिन अब प्रकृति का नियम रिवर्स गियर में है। शहर अब गांव, गांव अब जंगल की ओर बढ़ने लगे। आबादी बढ़ रही है और पेड़ कम होते जा रहे हैं, क्योंकि आबादी को पांव पसारने के लिए जगह कम पड़ गई है। गांव से निकलकर लोग शहरों की दौड़ लगा रहे हैं और शहर गांव की ओर बढ़ने लगा है। सीमेंट के जंगल में बदलता शहर अब जाम होता जा रहा है। यह जाम सड़कों पर गाड़ियों का तो है ही, साथ में संसाधनों और सेवाओं का भी है। 

शहर अब आबादी का दबाव संभालने की हालत में नहीं हैं। उसकी सड़कें, ड्रेनेज, सप्लाई, सेवाएं सब कुछ तो जाम होने लगी हैं। प्रेशर में वह फटा जा रहा है और अगर प्रेशर गांव की ओर रीलिज नहीं किया तो फट ही जाएगा। इस प्रेशर ने गांव के खेत खलिहान लील लिए या तेजी से लील रहा है। 

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